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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

ते हि धीराः सुराजानो दशास्वासु जयन्ति ये । तृणायतेऽत्र दिग्दन्तिघटाभटपराजयः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियों के साथ मन पर विजय पाना ही सव शत्रुओं की जयो से उत्कृष्ट जय है, स्वात्मसाम्राज्य ही सब राज्योसे बढ़कर राज्य है, अन्य राज्यश्रेष्ठ नहीं है, ऐसा कहते हैं । वे लोग बड़े धीर उत्तम राजा हैं, जो इन दशाओं में सर्वोत्कर्षरूप से स्थित हैं। इन दशाओं में स्थिति के आगे दिग्गजों की घटाओं के सहित सब शत्रुयोद्धाओं की पराजय तृण के तुल्य नगण्य है