Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
ये तासु भूमिषु जयन्ति हि ये महान्तो वन्द्यास्त एव हि जितेन्द्रियशत्रवस्ते ।
सम्राड्विराडपि च यत्र तृणायते वै तस्मात्परं जगति ते समवाप्नुवन्ति ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इन भूमिकाओं में जिनकी जीत होती है यानी उत्कृष्ट स्थान होता है वे
निश्चय ही महात्मा हैं, वे ही वन्दनीय है उन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओं पर विजय पाई है। जिसने
राजसूय यज्ञ किया, जो अकेला ही सारी पृथिवी का अधिपति है, राजाओं पर शासन करता
है, वह सम्राट यानी “युवा स्यात् साधु युवाद्यापक: | आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी
सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्द: ।* (अवस्था में युवा, केबल युवा ही नहीं
रोगादिविहीन युवा, शास्त्रवेत्ता, उत्तम शास्त्रोपदेशक, दुढदेहवाला ओर बलवान् हो एवं धन
से पूर्ण समस्त पृथिवी यदि उसके आधीन हो उसका जो आनन्द हे वही मनुष्य के पक्ष में एक
पूर्ण आनन्द हे ।) इस श्रुति द्वारा कहे मानुष आनन्द से पूर्ण ओर विराट भी यानी देवानन्द की
परम अवधि भी जिस सप्तम भूमिका में तृणतुल्य तुच्छ हो जाती हँ उससे बढ़कर विदेह कैवल्य
सुख को यहीं पर वे प्राप्त होते हैं