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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 119, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

भाः स्वात्मनीव कचति न कचत्येव तत्पदम् । भासां तत्त्वं हि कचनं पदं त्वकचनं विदुः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

सूर्य आदि की ज्योति के तुल्य वह स्वप्रकाश है भेद इतना ही है कि सूर्य आदि की ज्योति अपने में दीप्त होती है, किन्तु परमपद दीप्ति क्रिया को प्राप्त नहीं होता, क्योंकि दीप्ति क्रिया सूर्य आदि का स्वभाव है, परमपद को तो लोग निष्क्रिय कहते हैं