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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 31–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 119, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 31-33

संस्कृत श्लोक

चित्तात्सर्गसमापत्तिरचित्तात्सर्गसंक्षयः । परे परमसंशान्ते हेम्नीव कटकभ्रमः ॥ ३१ ॥ सन्नेव सर्गो सत्यत्वमेति चित्तशमोदये । असत्सत्तामवाप्नोति स्वतः संवेदनोदये ॥ ३२ ॥ संवेदनमहंतावत्सर्गसंभ्रमसंभ्रमः । असंवेदनमाशान्तं परं विद्धि न तज्जडम् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के आत्यन्तिक विनाश का अभाव ही आपके पुनः सृष्टिदर्शन में हेतु है, इस आशय से कहते हैं। अत्यन्त शान्त परमपद में चित्त से ही सर्ग की प्राप्ति होती है और चित्त के अभाव से ही सर्ग का नाश होता है | जैसे कि सुवर्ण मेँ कटक, कुण्डल आदि का भ्रम होता है। चित्त की शान्ति का उदय होने पर विद्यमान सृष्टि भी असत्‌ हो जाती है और चित्त का उदय होने पर असत्‌ सृष्टि भी अपने-आप सत्ता को प्राप्त हो जाती है । अभिमानयुक्त चित्त ही सृष्टिभ्रमण रूप भ्रान्ति है ओर चित्त अभाव को ही सर्वतः शान्त परमपद जानिये, वह परमपद जड नहीं है