Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 119, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
मायाचूर्णपरिक्षेपाद्यथा व्योम्नि पुरभ्रमः ।
तथा संविदि संसारः सारोऽसारश्च भासते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
एेन्द्रजालिक पुरुषो द्वारा दूसरे को मोह में डालने के लिए अभिमन्त्रित ओषधि के चूर्ण के
उड़ाने से आकाश मे नगर भ्रान्ति हो जाती हे वैसे ही ज्ञानरूप ब्रह्म में संसार सत्य ओर मिथ्या
भासित होता है यानी अधिष्ठान -सत्ता से सत्य और स्वतन्त्ररूप से असत् भासता है