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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

तत्रैव चिद्विलासेन प्रकाशोऽनुभवाद्भवेत् । तेजस्तन्मात्रकं तत्तु भविष्यदभिधार्थकम् ॥ २० ॥ तत्सूर्याग्निविजृम्भादिबीजमालोकशाखिनः । तस्माद्रूपविभेदेन संसारः प्रसरिष्यति ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

वायु की उत्पत्ति के पश्चात्‌ तेज की उत्पत्ति कहते हैं। तदुपरान्त “मेँ प्रकाशरूप होऊँ” इस भावना से उसीमें (चैतन्य में ही) प्रकाश की उत्पत्ति होती हे प्रकाशरूपता को प्राप्त अनुभवरूप चैतन्यसे ही रूपतन्मात्रा की उत्पत्ति होती है, जो कि सम्पूर्ण भावी पदार्थों के नाम और रूप की प्रकाशक है । सूर्य, अग्नि, बिजली, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि रूप वह तेज प्रकाशरूपी वृक्ष का बीज है । उससे (तेज से) विविध रूपों के भेद द्वारा संसार का विस्तार होता है