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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

असंप्राप्ताभिधाचारा चिज्जवात्प्रस्फुरद्वपुः । सा चैव स्पर्शतन्मात्रं भावनाद्भवति क्षणात् ॥ १८ ॥ पवनस्कन्धविस्तारं बीजं स्पर्शौघशाखिनः । सर्वभूतक्रियास्पन्दस्तस्मात्संप्रसरिष्यति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वही चैतन्य जव मैं वायु हूँ" इस अभिमान से युक्त होता है तब वह सम्पूर्ण स्पर्शो का उपादानकारण स्पशतन्मात्रारूप ओर आवह प्रवह आदि उनचास वायुओके विभाग से सम्पूर्ण पदार्थोकी वेष्टा का कारण होता है, ऐसा कहते हैं । यद्यपि “में वायु हूँ” इस अभिमान के पूर्वं उक्त चैतन्य का न “वायु नाम था और न उसमें > यद्यपि सांख्यदर्शन, पुराण आदि में तन्मात्राओं से भूतो की उत्पत्ति कही गई है, तथापि “आत्मन आकाशः सम्भूतः", "तत्तेजोऽसृजत, इत्यादि श्रुतिय मे ब्रह्म ही आकाश आदि भूतों का साक्षात्‌ उपादान सुना गया है ओर "तद्यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य इत्यादि श्रुति मेँ सामान्य शब्द विशेष शब्दों का कारण सुना गया है, अतएव आकाश से ही सामान्य शब्द रूप शब्दतन्मात्रा की उत्पत्ति कही गई है । चलनादि क्रिया ही थी, तथापि “मेँ वायु हूँ” इस प्रकार अपने में वायुत्व के व्यापारवान्‌ (चलनादि व्यापारसे युक्त) होकर स्पर्शतन्मात्रा की भावना से (“में स्पर्शतन्मात्रा होऊँ” इस संकल्प से) वही शीघ्र स्पर्शतन्मात्रा हो जाता है। वह (स्पर्शतन्मात्रा) विविध स्पर्शरूपी वृक्ष का बीज है तथा उनचास प्रकार के वायुओं का विस्तार उसमें सूक्ष्मरूप से निहित है । उसीसे सम्पूर्ण भूतों में चलनादि क्रियारूपी स्पन्द उत्पन्न होता है