Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चतुर्दशविधं भूतजालमावलितान्तरम् ।
जगज्जठरगर्तौघं प्रसरिष्यति वै ततः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह (परमात्मा) व्यष्टिप्राणरूप से आध्यात्मिक सम्पूर्ण क्रियाओंका हेतु है, ऐसा कहते हैं ।
चौदह भुवन हँ । प्रत्येक भुवनमें प्राणियोंका आकार-प्रकार भिन्न भिन्न है। अतएव चौदह
भुवनों के भेद से चौदह प्रकार के प्राणी पूर्वोक्त प्राणवायु के कारण अपने से (ब्रह्म से) व्याप्त
होकर ब्रह्माण्डोदररूप विविध गर्तो में घूमते फिरते हैं ॥