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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

तथैतानि विमिश्राणि विविक्तानि पुनर्यथा । न शुद्धान्युपलभ्यन्ते सर्वनाशान्तमेव हि ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

कितने समय तक वे संमिश्रणभाव में स्थित रहते हैं, ऐसी आकांक्षा होने पर कहते है । ये पाँच भूत इस प्रकार संमिश्रण को प्राप्त हुए हैं, जिस प्रकार विनाश होने तक (महाप्रलयपर्यन्त) पृथक्‌ और शुद्ध नहीं पाये जा सकते