Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
चिता विभाव्यमानानि तन्मात्राणि परस्परम् ।
स्वयं परिणतान्यन्तरम्बुनीव निरन्तरम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से उत्पन्न पाँच थूतों के संमिश्रण से ब्रह्माण्डाकार का विकास कहते है ।
चैतन्य के पूर्वोक्त रीति से पाँच भूतो में अहन्ता (अहंकारभाव) को प्राप्त होने पर उक्त
चैतन्य से ब्रह्माण्डाकार प्रतीत हो रहे भूततन्मात्रा अर्थात् शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा,
रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा ओर गन्धतन्मात्रा परस्पर से संमिश्रण से, जलमें बुदबुदों की नाई,
स्वयं ब्रह्माण्डाकार से परिणत होते हैं