Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
बीजं जगत्सु ननु पञ्चकमात्रमेव बीजं पराव्यवहितस्थितिशक्तिराद्या ।
बीजं तदेव भवतीति सदानुभूतं चिन्मात्रमेवमजमाद्यमतो जगच्छीः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पहले यह कहा था कि ब्रह्म ही जगत् के आकार में परिणत होता है, वह पूर्वोक्त रीति
से सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैं ।
दृश्यमान जगत् के मूल पंचभूततन्मात्रा ही हैं, पंचतन्मात्राओं का मूल मायाशक्ति ही है,
जिसका परमात्मा से तनिक भी व्यवधान नहीं है और जो जगत् की स्थिति में कारण है । इस
प्रकार चिद्घन अज परमात्मा ही मायाशक्ति द्वारा जगत् का बीज है। माया के हट जाने पर
वही सदा अनुभवारूढ़ होता है, इस लिए यह दृश्यमान जगत् चेतनरूप ही है