Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 13, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परमे ब्रह्मणि स्फारे समे राम समस्थिते ।
अनुत्पन्ननभस्तेजस्तमःसत्ता चिदात्मनि ॥ १ ॥
पूर्वं चेत्यत्वकलनं सतश्चेत्यांशचेतनात् ।
उदेति चित्तकलनं चितिशक्तित्वचेतनात् ॥ २ ॥
ततो जीवत्वकलनं चेत्यसंयोगचेतनात् ।
ततोऽस्य मायाकलनं चेत्यैकपरतावशात् ॥ ३ ॥
ततो बुद्धित्वकलनमहन्तापरिणामतः ।
एतदेव मनस्तादिशब्दतन्मात्रकादिमत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे युषुप्ति अवस्था में जीवप्रयोजक उपाधियों का (अन्तःकरण आदि का) विनाश
होने से वे मायाशबलब्रह्मभाव को प्राप्त होती हैं, वैसे ही प्रलयावस्था में विलय होने से
मायाशबल ब्रह्मभाव को प्राप्त हुई जीवप्रयोजक उपाधियों के फिर आविर्भावक्रम को
श्रीवसिष्ठजी हेतुपूर्वक कहते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सर्वव्यापक सम और असम (विकार से
होनेवाली विषमता से शून्य होने के कारण सम-एकरस-ओर मायाशबल होने के कारण
विषम) अधिष्ठानरूप उत्पन्न न हुए आकाश, तेज ओर तम आदि के कारणसत्तास्वरूप
(जब कि आकाश, तेज, तम आदि की उत्पत्ति नहीं हुई थी तब उनकी कारणरूप सत्ता
ब्रह्मसत्ता से अतिरिक्त नहीं थी) चिद्घन परब्रह्म में दृश्य अंश के प्रकाश से (५७६) पहले
दुश्यत्व (विषयभाव) की कल्पना उदित होती है, क्योकि चैतन्य का विषय को प्रकाशित
करना स्वभाव ही है । तदुपरान्त चितिशक्ति के प्रकाशन से उक्त चिदात्मा में चित्त की
कल्पना उदित होती हे, जिसका अध्यास किया जाता है, उसीका प्रकाशन करना चितिका
स्वभाव ही है । उक्त चिति के अध्यास के विषय सम्पूर्ण पदार्थो से पूर्व विद्यमान है, अतएव
वही सबके प्रति निमित्त है । तदनन्तर विषयों के साथ उसके सम्बन्ध का प्रकाश होने से
उक्त चिदात्मा में जीवत्व की कल्पना उदित होती है । “मेँ केवल विषयरूप हूँ” ऐसा
अभिमान होने के कारण उक्त चिदात्मा में अहंभावकी कल्पना उदित होती है । तदुपरान्त
उक्त अहंभाव की अभिवृद्धि होने से उक्त चिदात्मामें बुद्धिभाव की कल्पना उदित होती हे ।
इस प्रकार धर्मो की सिद्धि होने पर शब्दादितन्मात्राओं से युक्त वही मनःस्वरूप हो जाता
है । भाव यह कि जैसे स्वप्न में संस्काररूप से अपने अन्तर्गत शब्द आदि विषयों का मनन
होता हे, वैसे ही संस्काररूप से अपने अन्तर्गत शब्दादिविषयमात्राओं के मनन से वही
चिदात्मा शब्दादिविषयमात्राओं से युक्त मन बन जाता है
सर्ग सन्दर्भ
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग बरह्म के जीवभाव तथा देह आदि की प्राप्ति का वर्णन ।