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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

तदात्मनि स्वयं किंचिच्चेत्यतामिव गच्छति । अगृहीतात्मकं संविदहंमर्शनपूर्वकम् ॥ ४ ॥ भाविनामार्थकलनैः किंचिदूहितरूपकम् । आकाशादणु शुद्धं च सर्वस्मिन्भाति बोधनम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले उसमें “स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति (उसने संकल्प किया कि मैं लोकोंकी सृष्टि करूँ) इस श्रुति से सिद्ध ईक्षणभाव को दिखलाते हैं । आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल जो बोध है, वह भावी (होनेवाले) नाम और रूपों के अनुसन्धान से कुछ अनुमितरूपवाला होकर सम्पूर्ण स्रष्टव्य (सृष्टि करने योग्य) विषयों में संकल्पपूर्वक अहंकाराध्यास के बिना प्रतीत होता है अतएव वही स्वयं अपने स्वरूप में मानों किंचित्‌ चेत्यता (दृश्यता) को प्राप्त होता है