Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

जनैर्विहीनस्य कुदेशवृत्तेर्दुःखान्यनन्तानि समुल्लसन्ति । सहस्रशाखारससंकुलानि तृणानि वर्षास्विव पर्वतस्य ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वर्षा ऋतु में जनों से रहित तथा पृथिवी के एक देश में स्थित पर्वत के सैंकड़ों शाखाओं और रस से व्याप्त तृण उल्लास को प्राप्त होते हैँ वैसे ही स्वजनों से रहित, अत्यन्त गर्हित देश में रहनेवाले पुरुष के सैंकड़ों शाखा प्रशाखाओं से पूर्ण अनन्त दुःख उल्लास को प्राप्त होते हैं