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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

दैवोपतप्तस्य विबान्धवस्य मूढस्य रूढस्य महाधिभूमौ । यत्प्राणनं यन्मरणं महापद्यस्यात्मनिर्जीवितमुत्तमं तत् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस समय अपने सदश अन्य जनकी भी निन्दा करती हुई कहती है। भाग्य से सताये गये, बन्धु-बान्धव हीन, मुर्ख और बड़ी भारी मानसिक व्याधिभूमि में उत्पन्न हुए (सदा मानसिक चिन्ता से युक्त) इस प्रकार के प्राणी का जो जीवन है, जो मरण है और जो महाआपत्ति है, उसकी अपेक्षा स्वतः जीवरहित पाषाण आदि उत्तम हैं