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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verses 23–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 23,24

संस्कृत श्लोक

मृतेश्वराश्वस्तनिजात्मजास्मि दुर्देशयातास्मि च दुर्गताऽस्मि । दुर्जातिजातास्मि महापदेऽस्मि साक्षाद्भयं भोऽस्मि महापदस्मि ॥ २३ ॥ नीचावमानप्रभवस्य मन्योः क्षुधाप्रपन्नस्य कलत्रकस्य । शोकस्य वृत्तावनिवार्यवृत्तेर्नार्यस्म्यनेकायतनं विनाथा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अब अपने भाग्य को कोसती है । हे सखियों, बडे क्लेश की बात है कि मेरे पतिदेव मर चुके हैं, अभी जल्दी मेरी लड़की मर गई है, इस दुर्देश में मैं पड़ी हुई हूँ, बड़ी दरिद्र हूँ, चण्डाल जाति में पैदा हुई हूँ, बड़े संकट में फँसी हूँ, मुझे आप साक्षात्‌ भय जानिए, मैं महती विपत्ति में हूँ। अनाथ मैं नीच के अपमान करने से उत्पन्न हुए क्रोध की, क्षुधा से पीडित हुए पुत्र, कलत्र आदि पोषणीय लोगों के आहार के विषय में अवश्यभावी शोक की और भी इसी प्रकार के अन्यान्य दुःखों की एकमात्र घर रूप नारी बनाई गई हूँ