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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सा त्रस्तसारङ्गसमाननेत्रा स दृप्तशार्दूलसमानवीर्यः । उभौ गतावेकपदेन नाशमाशा सहार्थेन यथा महेहा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दुर्भाग्य के दिन आने पर बहुत मनोरथों से युक्त आशा धन के साथ नष्ट हो जाती है, वैसे ही भयभीत हिरनी के सदुश विशाल नेत्रवाली वह मेरी लड़की तथा मदोन्मत्त शेर के समान बलशाली वह मेरा जमाई दोनों एक साथ विनष्ट हो गये