Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
काकतालीयवच्चेतोवासनावशतः स्वतः ।
संवदन्ति महारम्भा व्यवहाराः परस्परम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि सब पदार्थ अविद्या से कल्पित ही हैं तथापि उत्तर व्यवहार से पूर्व व्यवहार का
संवाद होने से सत्यत्व ओर असंवाद होने से मिथ्यात्व व्यवहार होता है, न कि परमार्थ विचार
से। इस पर कहते हैं।
कोई कौआ एक ताड़ के वृक्ष में जा रहा था। ताड़ के वृक्ष से कौए का संयोग होते ही दैववश
उसका फल नीचे गिरा, इसे ही काकतालीय न्याय, अर्थात् आकस्मिक घटना कहते हैँ । चित्त
के संस्कारवश काकतालीय न्याय से बिना किसी कारण के महान् आरम्भवाले व्यवहारों का
परस्पर एक दूसरे से संवाद होता है