Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 37–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
न संभवति संबन्धो विषमाणां निरन्तरः ।
न परस्परसंबन्धाद्विनानुभवनं मिथः ॥ ३७ ॥
सदृशे सदृशं वस्तु क्षणाद्गत्वैकतामलम् ।
रूपमास्फारयत्येकमेकत्वादेव नान्यथा ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त दोनों प्रकारो को दो श्लोकोसे फिर स्पष्ट कहते है ।
अत्यन्त विषम पदार्थो का निरन्तर (साक्षात्) सम्बन्ध नहीं हो सकता है तथा परस्पर
सम्बन्ध के बिना परस्पर अनुभव भी नहीं हो सकता हे