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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 42–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verses 42–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 42-44

संस्कृत श्लोक

जिह्वयैव रसास्वादः सजातीयामलोदयः । ऐक्यं च विद्धि संबन्धं नास्त्यसावसमानयोः ॥ ४२ ॥ जडचेतनयोस्तेन नोपलादि जडं मतम् । चिदेवोपलकुड्यादिरूपिणीति मिता चिता ॥ ४३ ॥ एकीभावं गता द्रष्टदृश्यादि कुरुते भ्रमम् । काष्ठोपलाद्यशेषं हिं परमार्थमयं यतः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जलमय होने से सजातीय जिह्वा ओर रस से स्पष्ट उदित हुआ रसास्वाद भी जो कि परिणामी है, जिह्ा से ही अनुभूत होता हे । किंचित्‌ अभिन्न का ही ऐक्य सम्बन्ध होता है, उसका दोनों पक्षो में सम्भव नहीं है, ऐसा कहते हैं। किंचित्‌ अभिन्न का जो ऐक्य है, उसे ही आप सम्बन्ध जानिये । वह अत्यन्त असमान जड़ और चेतन का नहीं हो सकता, इसलिए पत्थर आदि पदार्थ जड़ नहीं हैं किन्तु चेतन ही पत्थर, दीवार आदि रूपवाला है, इसलिए परमार्थदृष्टि से एकीभाव को प्राप्त हुआ चैतन्य ही सत्य है, द्रष्टा, दृश्य आदि भाव भ्रम हैं, क्योंकि काठ, पत्थर आदि सब पदार्थ चिन्मय ही हैं