Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
दारुपाषाणभेदानां नतु ह्येते चिदात्मकाः ।
पदार्थो हि पदार्थेन परिणाम्यनुभूयते ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि जैसे जाडयरूप धर्म के कारण साम्य होने पर भी काठ, पत्थर, मिट्टी
आदि का एक घर के अवयवरूप से सम्बन्ध होता है और जैसे जलमय होनेसे सजातीय जिह्ला
तथा रस का सम्बन्ध होता है, वैसे ही चिद्रूप होने से सद्वश होने पर भी ज्ञान तथा ज्ञेय का
सम्बन्ध हो सकता है, इस पर कहते हैं।
काठ, पत्थर आदि जो भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, वे चिद्रूप नहीं हैं, क्योंकि काठ आदि जड़
पदार्थ गृह आदि पदार्थों के रूप से परिणत होते हुए अनुभूत होते हैं। चेतन कभी परिणामी नहीं
होता है, यह अर्थ है