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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 60

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 60

संस्कृत श्लोक

यथा देशान्तरनरो यथा काष्ठं यथोपलः । तथैव पश्य चित्तं त्वमचित्तैव यदात्मना ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दूर देश में स्थित मनुष्य रहता हुआ भी असत्‌ के तुल्य है और जैसे काठ और पत्थर समीप में होने पर भी चेतन हीन होने से ही आसक्ति, अभिमान आदि के अयोग्य हैं, वैसे ही आप चित्त को जानिये, क्योंकि आत्मरूप से विचार करने पर अचित्तता ही विद्वानों के अनुभव से सिद्ध है