Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
भविष्यद्ग्रामकग्राम्यकार्यव्यवसितो यथा ।
चित्तवृत्तिषु मा तिष्ठ तथा सत्यात्मतां गतः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तरह अप्राप्त वस्तु में चित्त की अनासक्ति स्वतः सिद्ध है, उसी तरह वर्तमान वस्तु
में भी मिथ्यात्वद्रष्टि से अनासक्तिका सम्पादन करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
जैसे आप अप्राप्त ग्राम के ग्राम्यव्यवहार में आसक्तिरहित हैं वैसे ही सत्य आत्मा में स्थित
होकर चित्त की वृत्तियों में मिथ्यात्वदृष्टि से आसक्ति रहित होइये