Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 64–65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verses 64–65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 64,65

संस्कृत श्लोक

निरन्तरमनादृत्य त्वमाराच्चित्तपुष्कसम् । स्वस्थमास्स्व निराशङ्कं पङ्केनेव कृतो जडः ॥ ६४ ॥ चित्तं नास्त्येव मे भूतं मृतमेवाद्य वेत्ति वा । भव निश्चयवान्भूत्वा शिलापुरुषनिश्चलः ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आप इस चित्त रूपी चण्डाल का निरन्तर दूर से ही निरादर करके मिटटी की बनी हुई जड मूर्ति के तुल्य स्वस्थ होकर आशंकाहीन स्थित होइये । यथार्थ में चित्त है ही नहीं, यही मुख्य पक्ष हे अथवा उत्पन्न हुआ भी हो, तो वह मर गया है, आज मृतक होकर ही पदार्थो को देखता है यानी मिथ्या देखता है, ऐसा निश्चय करके आप पत्थर के बने हुए पुरुष की तरह निश्चल होडये