Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
अत्यन्तानात्मभूतस्य यश्चित्तस्यानुवर्तते ।
पर्यन्तवासिनः कस्मान्न म्लेच्छस्यानुवर्तते ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध आत्मा का अशुद्धचित्त का अनुवर्तन भी अनुचित है, इस आशय से कहते हैं।
अत्यन्त अनात्मभूत चित्तवृति का जो अनुवर्तन करते हैं, वे प्रत्यन्त देशवासी म्लेच्छों का
अनुवर्तन क्यों नहीं करते ? “तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्वयानि
(प्रत्यन्तवासी जनों में पाप निहित है, इसलिए उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये, उनके स्थान
में नहीं जाना चाहिये, अन्यथा पापरूप मृत्यु को हम लोग प्राप्त होंगे) इस श्रुति के अनुसार
म्लेच्क्षादि का अनुसरण करना निषिद्ध है, यह भाव हे