Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यावन्न कुर्वन्नपि व्यवहरन्नप्यसत्येषु संसारवस्तुषु स्थितोऽपि स्वात्मन्येव क्षीणमनस्त्वादभ्यासवशाद्बाह्यं वस्तु कुर्वन्नपि न पश्यति नालम्बनेन
सेवते नाभिध्यायति तनुवासनत्वाच्च केवलं मूढः सुप्तप्रबुद्ध इव कर्तव्यं करोति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
कितने काल तक भावना की तनुताका अभ्यास करना चाहिए, इस प्रश्न पर कहते हैं।
जब तक समाधिस्थ हो, चाहे समाधि से व्युत्थित हुआ हो, चाहे असत् संसार वस्तुओं में
स्थित हो, अपनी आत्मा में ही क्षीणमन होने के कारण अभ्यासवश बाह्यवस्तुओं को करता
हुआ भी नहीं देखता है, अतएव रूचि से उनका सेवन नहीं करता है, न कभी उसका स्मरण
करता है, सूक्ष्म वासनावाला होने के कारण केवल बालक या उन्मत्त अथवा आधा सुप्त और
आधा प्रबुद्ध के समान स्नान, भोजन आदि कर्तव्य को दूसरे की इच्छा से करता हे, तब तक
उसका अभ्यास करे