Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
नाभिनन्दति संप्राप्तं नाप्राप्तमभिशोचति ।
केवलं विगताशङ्कं संप्राप्तमनुवर्तते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि पूर्व की भूमिकाओं में भी जिन्होंने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वे जीवन्मुक्त
ही हैं तथापि उनमें कभी प्रबल प्रारब्ध से प्राप्त कराये गये प्रिय, अप्रिय का सम्बन्ध होता है,
अतः उनमें मुख्य जीवन्मुक्ति सुख नहीं है । सातवीं भूमिका में योग के परिपाक से उत्पन्न
पुण्य के प्राचुर्य से, जो अति प्रबल है, तिरस्कृत हुआ प्रारब्ध कर्म केवल जीवन व्यवहार के
आभास में पर्यवसित होता है, हर्ष, शोक आदि को उत्पन्न करने के लिए नहीं होता है, इस
आशयसे उसका लक्षण पद्य से कहते हैं।
जीवन्मुक्त पुरूष प्राप्त हुई वस्तु का अभिनंदन नहीं करता यानी किसी वस्तु के प्राप्त
होने पर प्रसन्न नहीं होता और खोई हुई वस्तु के लिए शोक नहीं करता | जो कुछ प्राप्त हो
गया, केवल उसीका भय, आशंका से रहित होकर अनुवर्तन करता है