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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अविनाशोऽपि कस्मात्त्वं विनश्यामीति शोचसि । अमृत्युवसतौ स्वच्छे विनाशः क इवात्मनि ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

आप अविनाशी हँ फिर भी मैं विनष्ट होऊँगा, इस प्रकार शोक क्यों करते हैं ? आत्मा मृत्यु का निवासभूत नहीं है और निर्मल है, अतएव उसमें विनाश का प्रश्न ही कैसे उठ सकता है ?