Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
मृगतृष्णातरङ्गिण्यां क्षीणायामातपो यथा ।
न नश्यति तथा देहे नष्टे नात्मा विनश्यति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्य की किरणों पर
प्रतीत हो रही मृगतृष्णा रूपी नदी के नष्ट होने पर धूप नष्ट नहीं होती, वैसे ही देह के नष्ट होने
पर आत्मा नष्ट नहीं होता