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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

यानीमानि विचित्राणि दुःखानि परिपश्यसि । तानि देहस्य सर्वाणि नाग्राह्यस्य चिदात्मनः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

अब असंसारी आत्मा को दशनि के लिए चित्त को भी देहकोटि में रखकर देह को ही प्रिय ओर अप्रिय का स्पर्श होता है, ऐसा कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, जो आप इन विविध दुःखों को देखते है, वे सब देह के ही हैं, इन्द्रियों द्वारा गृहीत न होनेवाले चिदात्मा के नहीं हैं ।