Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
मनोमार्गादतीतत्वाद्यासौ शून्यमिव स्थिता ।
चित्कथं नाम दुःखैर्वा सुरवेर्वा परिगृह्यते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के अगोचर होने के कारण जो यह
चिदात्मा शून्य की तरह स्थित हे, वह सुख ओर दुःखों से व्याप्त कैसे हो सकता है ?