Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
स्वास्पदात्मानमेवासौ विनष्टाद्देहपञ्जरात् ।
अभ्यस्तां वासनां यातः षट्पदः खमिवाम्बुजात् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि देह के नष्ट होने पर जीव कहाँ जाता है 2 तो इस पर कहते है ।
जैसे भ्रमर कमल से उड़कर आकाश में जाता हे वैसे ही यह जीव नष्ट हुए देह के अभिमान
का त्याग कर पहले अपने आधारभूत परमात्मा में ही जाता हे ।
मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् । (मन प्राण में लीन होता है, प्राण तेज में
लीन होता है और तेज परमात्मा मे लीन होता है।) इस श्रुतिप्रमाण से मन, प्राण आदि उपाधियो
से विहीन होने से जीव बिम्बभूत ईश्वरैक्य को प्राप्त होता है ।
शंका : ईश्रैक्य को प्राप्त होकर वह मुक्त क्यो नहीं होता ?
समाधान : वह चिरकाल से अभ्यस्त भेदवासना को प्राप्त हुआ है यानी भेदवासना का
मूलोच्छेद करनेवाले ज्ञान का उदय न होने से उसकी मुक्ति नहीं होती