Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
असच्चेदात्मतत्त्वं तदस्मिंस्ते देहपञ्जरे ।
नष्टे किं नाम नष्टं स्याद्राम केनानुशोचसि ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप शंका करे कि यदि जीव प्रतिबिम्ब है, तो उसकी उपाधि से अतिरिक्त सत्ता न
होने से वह असत् ठहरा और उपाधि का नाश होने से उसका नाश हो जायेगा। भले ही ऐसा
हो, तथापि आप जीव नहीं हैं। जीव के न रहने पर अथवा नाश होने पर आपको शोक नहीं
करना चाहिए, ऐसा कहते हैं।
वह प्रसिद्ध आत्मतत्त्व यानी जीव यदि असत् हो, तो इस आपके देहपिंजर के नष्ट होने पर
आपका क्या नष्ट हुआ और आप किसलिए शोक करते हैं २।