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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verse 54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 13, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

आकाश एव परमे प्रथमः प्रजेशो नित्यं स्वयं कचति शून्यतया समो यः । स ह्यातिवाहिकवपुर्नतु भूतरूपी पृथ्व्यादि तेन न सदस्ति यथा न जातम् ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

सिहावलोकन न्याय से पूर्वोक्ति सम्पूर्ण विषय का पुनः संक्षेप से निरूपण कर उपसंहार करते हैं। परब्रह्म मेँ कल्पित स्वयम्भू प्रजापति शून्य ही है जो एकरस परमात्मा है, उसीका स्वयं असत्‌ प्रजापतिरूप से आभास होता है, क्योकि प्रजापति का मनोमय शरीर है पंचभौतिक शरीर नहीं है । ये पृथिवी आदि मनोमयशरीरवाले प्रजापति के संकल्पमात्र है, अतएव ये भी असत्य है । जैसे कभी उत्पन्न न हुआ खरगोश का सींग सत्य नहीं है, वैसे ही ये भी सत्य नहीं हे