Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 1–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verses 1–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 1-10
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थं जगदहंतादिदृश्यजातं न किंचन ।
अजातत्वाच्च नास्त्वेव यच्चास्ति परमेव तत् ॥ १ ॥
परमाकाशमेवादौ जीवतां चेतति स्वयम् ।
निःस्पन्दाम्भोधिकुहरे सलिलं स्पन्दतामिव ॥ २ ॥
आकाशरूपमजहदेवं वेत्तीव हृद्यताम् ।
स्वप्नसंकल्पशैलादाविव चिद्वृत्तिरान्तरी ॥ ३ ॥
पृथ्व्यादिरहितो देहो यो विंराडात्मको महान् ।
आतिवाहिक एवासौ चिन्मात्राच्छनभोमयः ॥ ४ ॥
अक्षयः स्वप्नशैलाभः स्थिरस्वप्नपुरोपमः ।
चित्रकृत्स्थिरचित्तस्थचित्रसैन्यसमाकृतिः ॥ ५ ॥
अनिखातमहास्तम्भपुत्रिकौघसमोपमः ।
ब्रह्माकाशेऽनिखातात्मा सुस्तम्भे शालभञ्जिका ॥ ६ ॥
आद्यः प्रजापतिः एवं स्वयंभूरिति विश्रुतः ।
प्राक्तनानां स्वकार्याणामभावादप्यकारणः ॥ ७ ॥
महाप्रलयपर्यन्तेष्वाद्यकालपितामहाः ।
मुच्यन्ते सर्व एवातः प्राक्तनं कर्म तेषु किम् ॥ ८ ॥
सोऽकुड्य एव कुड्यात्मा दृश्यादृश्यः स्वयंस्थितः ।
न च दृश्यं न च द्रष्टा न स्रष्टा सर्वमेव च ॥ ९ ॥
प्रतिशब्दपदार्थानां सर्वेषामेष एव सः ।
तस्मादुदेति जीवाली दीपाली दीपकादिव ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले समष्टि (हिरण्यगर्भ), उससे उत्पन्न विराट् और व्यष्टि जीव इस प्रकार के
परिच्छेद के खण्डन के लिए श्रीवकतिष्ठजी पूर्वोक्त विषय के अनुवाद द्वारा भूमिका बोधते हैं ।
जैसा कि पहले सर्ग में कहा गया है, उसके अनुसार अहन्ता आदि दृश्यसमूहभूत जगत् का
अस्तित्व तनिक भी नहीं है, क्योंकि वह उत्पन्न ही नहीं हुआ है और जिसका अस्तित्व है, वह
परमात्मा ही हे । जैसे निश्चल सागर में जल स्पन्दता को (चंचलताको) प्राप्त होता है, वैसे ही
सृष्टि के आरम्भमें परमप्रकाशरूप परमात्मा ही मेँ जीव हूँ "इस प्रकार स्वयं जीवता की भावना
करता हे जैसे देह के अन्दर विद्यमान चेतनवृत्ति स्वप्न में देखे गये या मनोरथ द्वारा कल्पित
पर्वत, नगर आदि में आत्मीयता के भ्रम से प्रेम करती है, वैसे ही अपनी आकाशरूपता
(परमप्रकाशरूपता) का त्याग किये बिना ही संकल्परूप चिद्वृत्ति वक्ष्यमाण विराट् में
आत्मत्वभरान्ति से मानों प्रेम करती है, यही मेरी आत्मा है, इस भ्रम से उसको मानों अपने
प्रेमका पात्र समझती है । चिदात्मा की जो विराट्रूप देह है, वह पृथिवी आदिसे शून्य है,
अर्थात् पांचभौतिक नहीं हे, किन्तु मनोमय ही है (संकल्पजन्य ही है) अतएव वह चिन्मात्र
निर्मल आकाशस्वरूप ही है, उससे पृथक् नहीं है । यदि स्वप्न में देखा गया पर्वत अक्षय
(चिरस्थायी) हो और स्वप्न में दुष्ट नगर चिरकाल तक रहे, तो उनसे इस प्रपंचरूप विराट् देह
की तुलना हो सकती है ओर सचमुच यह प्रपंच चित्रकारका चित्त यदि स्थिर हो और उसमें
वासनामय स्थिर चित्र वने तो उसमें कल्पनालिखित सेना के सदृश हे । बहुत कहाँ तक कहें,
यह महान् खम्भों की उन प्रतिमाओं के सदृश है, जो कि गढी नहीं गई है, ऐसे ही और भी
अनेकों उपमानं से इसकी उपमा हो सकती है । मान लीजिये, यह प्रपंच चिदाकाशरूपी सुन्दर
खम्भ में नहीं गढी गई एक प्रतिमा है । आदि प्रजापति का भी, जो “स्वयम्भू इस नाम से सबसे
पहले विख्यात हुआ, कोई कारण नहीं हे, क्योंकि उसके पूर्वजन्म के कर्म नहीं हे । क्यों नहीं ?
ऐसी शंका के लिए यहाँ अवकाश ही नहीं हे, क्योकि हम पहले ही कह आये हैं कि महाप्रलय
होने पर पूर्वकल्प के सभी प्रजापति मुक्त हो जाते हैं, अत: उनमें प्राक्तन (पूर्वजन्म का) कर्म
कैसे रह सकता है ? जैसे आवरणरहित दर्पण आदि में प्रतिबिम्बरूप से पड़ी हुई दीवार आदि
का स्वरूप दिखाई देता हुआ भी असत् होने से अदृश्य (दर्शनयोग्य नहीं) है, वैसे ही प्रजापति
दृश्य होता हुआ भी सत् न होने से अदृश्य ही है और विकारशून्य चिदात्मा में कल्पित हे ।
निर्विकार चिदात्मा में द्रष्टा, दुश्य तथा दर्शन, स्रष्टा, सृष्टि तथा सर्जन एवं भोक्ता, भोग्य
और भोग इन सम्पूर्णं त्रिपुटियों का संभव ही नहीं हे, अतः स्रष्टा प्रजापति असत् है । सबका
निषेध होने पर भी शब्द ओर अर्थो की शून्यता नहीं है, कारण कि यह प्रत्यगातमा ही सम्पूर्ण
शब्द ओर अर्थो का आत्मरूप से स्थित हे । जैसे एक दीपक से अनेक दीपक उत्पन्न होते हैं
(जलाये जाते हैं) वैसे ही सम्पूर्ण जीव उसीसे आर्विभूत होते हैं
सर्ग सन्दर्भ
तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग॑ पूर्व सर्ग में वर्णित जीवभावमें परिच्छेद आदि सन्देहो का युकिति से खण्डन कर केवल मात्र ब्रह्मैक्य का वर्णन |