Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
संकल्प एव संकल्पात्किलैति क्ष्मादिवर्जितः ।
आदिमादिव निःशून्यः स्वप्नात्स्वप्नान्तरं यथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
विराट् घनसंकल्पस्वरूप है, उसका कार्य होने से व्यष्ट्यात्मक जीव भी संकल्प ही है,
पृथिवी आदि पंचभूतों से निर्मित नहीं है, ऐसा कहते हैं ।
जैसे संकल्परूप हिरण्यगर्भ से मिथ्या होने के कारण अत्यन्त शून्य संकल्परूप विराट्
उत्पन्न हुआ है तथा जैसे मिथ्याभूत स्वप्न से अन्य मिथ्याभूत स्वप्न उत्पन्न होता है, वैसे ही
पृथिवी आदि से शून्य संकल्पात्मक विराट् से संकल्परूप जीव उत्पन्न हुआ है