Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्दरूपिणोरस्ति न भेदः कर्तृकर्मणोः ।
स्पन्दमात्रं भवेत्कर्म स एव पुरुषः स्मृतः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
वैसा होने पर भी चित् के स्वभाव में अन्तर नहीं आता, ऐसा कहते हैं।
यद्यपि चित् का चित्त्वरूप से (जीवभाव-जगत्भावरूप से) विकास अपने विकार अहन्ता
आदि से अवच्छेद्य (परिच्छेद के योग्य) होकर अपने द्वारा बनाये जानेवाले जीव आदिनामक
हो गया है, तथापि उपाधि आदि से अवच्छिन्न रूप का, उपाधि के मिथ्या होने से, अस्तित्व
नहीं है जब उसका अस्तित्व है ही नहीं, तब भेद का प्रसंग कहाँ से होगा २।५६॥
चित्- शक्ति और स्पन्दशक्ति के भेद से चितृशक्तिरूप अहंकार और स्पन्दशक्तिरूप
प्राण इन उपाधियों से युक्त जीवकृत भेद है ही, इस शंका पर कहते हैं।
चितिरूपी (चित्प्रधान) कर्ता यानी अहंकार और स्पन्दरूपी (स्पन्दप्रधान) कर्म यानी
प्राण में कोई भेद नहीं हे । चित् का स्पन्दमात्र ही तो कर्म (प्राण) है। क्या कर्ता भी कभी अपनी
क्रिया से भिन्न होता है ? चित् और स्पन्द से संवलित ही जीव कहा गया है, अतः जीवप्रयुक्त
भेद नहीं है, यह भाव है