Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
जीवश्चित्तपरिस्पन्दः पुंसां चित्तं स एव च ।
मनस्त्विन्द्रियरूपं सत्सत्तां नानेव गच्छति ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त, मन, इन्द्रिय आदि भाव में भी जीवकरत भेद नहीं होता, क्योकि जीव का उपाधिरूप
मन ही विभिन्न गोलको के (इन्द्रियों के चिद्ठ आँख, कान, नासिका आदि) भेद से इन्द्रियरूप
हुआ है, ऐसा कहते हैं।
जीव चित् का चित्तपरिस्पंदरूप (संकल्परूप) है और पुरुषों का चित्त भी संकल्परूप ही
है और मन भी तत् तत् गोलकों के भेद से इन्द्रियरूप होकर नानारूप होता है