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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 76

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 76

संस्कृत श्लोक

अत्र भेदविकारादि नखे मलमिव स्थितम् । इतीदं सन्मयत्वेन सदसद्भुवनत्रयम् ॥ ७६ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र चित्‌ से भिन्न सत्तावान्‌ होने से ही जगत्‌ चिद्धर्म माना गया है, ऐसा स्पष्टरूप से कहते हैं । जैसे आकाश में यद्यपि भरमवश नीलिमा की प्रतीति होती है, पर वस्तुतः वह है नहीं, वैसे ही इस चिद्घन परमात्मा में यद्यपि भान्ति से भेद ओर विकार आदि की प्रतीति होती है, पर वस्तुतः इसमें भेद आदि है नही । इस प्रकार ये तीनों भुवन यद्यपि असत्‌ हैं, तथापि पूर्वोक्त रीति से सन्मय (चिन्मय) होने के कारण ये सद्‌ हैं, यह भावहै। यदि पूर्वोक्त रीति से सन्मय होने के कारण ही जगत्‌ की सत्ता है, चित्‌ सत्ता से जगत्‌ की सत्ता अतिरिक्त नहीं है । तो जगत्‌ की असत्ता दूसरी हेतु होगी, इस शंका पर कहते हैँ । अधिष्ठानरूप होने के कारण कल्पित पदार्थ की सत्ता ओर असत्ता अभिन्न ही है । भाव यह कि कल्पित की सत्ता ओर असत्ता कल्पित के अधिष्ठान से अतिरिक्त कहीं नहीं देखी गई है । अतः जगत्‌ की असत्ता अतिरिक्त पदार्थ है, यह कथन ठीक नहीं है