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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 78

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 78

संस्कृत श्लोक

अनुभूत्यपलापाय कल्पितो यैर्धिगस्तु तान् । न विद्यते जगद्यत्र साद्र्यब्ध्युर्वीनदीश्वरम् ॥ ७८ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त विषय में युक्तिविरोध भी कहते हैँ । चिन्मय होने के कारण जिसमें पर्वत, सागर,पृथिवी, नदी-नद ओर उनके अधिष्ठाता देवताओं के साथ जगत्‌ पूर्वोक्त रीति से नहीं रहता है, उसमें अन्य का (अवयव आदिका) भ्रम केसे हो सकता है, यह भाव हे