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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 82–83

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verses 82–83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 82,83

संस्कृत श्लोक

अन्यानन्यात्मकमिदं धत्तेऽन्तश्चित्स्वभावतः । समस्तकारणौघानां कारणादि पितामहः ॥ ८२ ॥ स्वभावतो कारणात्म चित्तं चिद्ध्यनुभूतितः । न चासत्त्वमचेत्यायाश्चितो वाचापि सिद्ध्यति ॥ ८३ ॥

हिन्दी अर्थ

जगतूरूप विकार का निर्विकार चिदाकाश उपादान है, अतएव जगत्‌ असत्‌ है, ऐसा अब तक कहा । अव हजारों मिथ्या विकल्परूप चित्तोके समष्टि भूत हिरण्यगर्भ से उत्पन्न होने के कारण भी जगत्‌ मिथ्या है, ऐसा कहते हैँ । संसार में जितने कार्य दृष्टिगोचर होते हैं, उन सम्पूर्ण कार्यो के अखिल कारणों का ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ) आदि कारण है, चित्त से उत्पन्न मनोरथ से होनेवाले विकल्प असत्‌ होते हें, अतएव चित्त स्वभाव से ही कारण अभावरूप है (कारण नहीं है) उक्त कारण अभावरूप चित्त ही ब्रह्मा है अतः यह सिद्ध हुआ कि जैसे चित्त के कार्यभूत मनोरथ से होनेवाले विकल्प असत्‌ है, वैसे ही उक्त ब्रह्मा से उत्पन्न जगत्‌ मिथ्या है । यदि किसी को यह शंका हो कि चेत्य के (जगत्‌ के) असत्‌ होने पर चित्‌ का भी असत्त्व हो जायेगा, क्योकि चित्‌ स्वस्वरूपभूत चेत्यसे अतिरिक्त नहीं है, इस पर कहते हैँ कि चित्‌ की असत्ता वाणी मात्र से भी सिद्ध नहीं हो सकती, क्योकि चित्‌ अनुभव से सिद्ध हे । अनुभव से विरुद्ध अर्थ में वाणी प्रमाण नहीं होती, यह भाव हे