Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 84
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 84 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
यदस्ति तदुदेतीति दृष्टं बीजादिवाङ्कुरः ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि जगत् स्वतः (अपनी सत्ता से न कि ब्रह्मसत्ता से) सत् होता, तो ज्ञान आदि सहतस्त्रों
उपायो से भी उसका विनाश कदापि नहीं हो सकता, क्योकि सत् का आत्यन्तिक (समूल)
विनाश तो कभी हो ही नहीं सकता । ऐसी दशा में उसके पुनः आविभवि का वारण न हो सकने
से कभी किसी का मोक्ष ही नहीं हो सकेगा, इस आशय से कहते है।
जो है, उसका बीज से अंकुर की नाई अवश्य ही उदय होता, यह बात एक बार नहीं हजारों
बार देखी गई हे, इससे यह सिद्ध हुआ कि जगत् की स्वतः सत्ता नहीं हैं