Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नपुरं स्वच्छं जाग्रत्पुरवरं प्रति ।
तथा जगदिदं स्वच्छं सांकल्पिकजगत्प्रति ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि दृश्य अत्यन्त मलिन है, वह अति स्वच्छतम चिन्मात्र कैसे हो सकता
है? तो इस पर प्रतीति काल में ही बाह्य (बाहर के) ओर आन्तर (मानसिक) दृश्यों की
मलिनता प्रतीत होती है । जब उनका तिरोभाव हो जाता है, तब परस्पर की अपेक्षा यानी
मलिनता और स्वच्छता दो में से केवल स्वच्छतमता ही शेष रह जाती है, ऐसा कहते हैं।
जैसे जाग्रत्काल के सुन्दरनगर के प्रति स्वप्न का नगर स्वच्छ है, वैसे ही संकल्प से
उत्पन्न (काल्पनिक) और स्वाप्निक जगत् के प्रति यह जाग्रत् प्रपंच भी स्वच्छ है। भाव यह
कि इसकी अस्वच्छता तभी तक है जब तक यह प्रतीत होता है इसका तिरोभाव होने पर परम
स्वच्छता ही शेष रह जाती है । अतएव अत्यन्त मलिन दृश्य की अति स्वच्छतम चिन्मात्रता
कैसे ? इस शंका के लिए अवसर ही नहीं है