Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
इदं त्वचेत्यचिन्मात्रं भानोर्भातं नभः प्रति ।
तथा सूक्ष्मं यथा मेघं प्रति संकल्पवारिदः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जब जगत् और ब्रह्म में को भेद ही नहीं है, तब तत्त्वज्ञानियों को जगत् की अपेक्षा (जगत्
से अतिरक्त) जगत् के साक्षी का दर्शन कैसे होता है, ऐसी शंका होने पर जैसे शून्यरूप
आकाश सूर्य प्रकाश प्रतीत होता है, वैसे ही शून्य रूप जगत् के प्रति तत्त्वज्ञानियों का जगत्-
साक्षी-दर्शन है ऐसा कहते हैं ।
जैसे रूप शून्य आकाश के प्रति सूर्य का प्रकाशकत्वदर्शन है, वैसे ही अचेतन
(चेत्यसंसर्गरहित) चिन्मात्ररूप इस जगत् के प्रति इसके साक्षी का भान होता है।
शंका - तब साक्षी चैतन्य की अपेक्षा (साक्षीचैतन्य से अतिरिक्त) जगत् की प्रतीति कैसे
होती है ?
समाधान - जैसे संकल्प से कल्पित मेघ सत्यमेघ के प्रति (असत्) है, वैसे ही जगत्-
दर्शन चैतन्य के प्रति (असत्) है