Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
वर्जयित्वा ज्ञविज्ञानं जगच्छब्दार्थभाजनम् ।
जगद्ब्रह्मस्वशब्दानामर्थे नास्त्येव भिन्नता ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानियों की दृष्टि से ही ब्रह्म आदि शब्दों के अर्थ से जगत् शब्दके अर्थ का भेद है,
तत्त्वज्ञानी लोगों की दृष्टि से नहीं, ऐसा कहते हैं।
जगत्शब्द के अर्थ के भाजन अज्ञ लोगों के विज्ञान के सिवा जगत् , ब्रह्म और आत्मशब्दों
के अर्थ में कोई भी भेद नहीं है, भाव यह कि जगत्शब्द का ब्रह्मशब्द के अर्थ से अतिरिक्त अर्थ
अज्ञानियों को प्रतीत होता है, पर वास्तव में जगत्, ब्रह्म और स्व (आत्म) शब्दों के अर्थ में
भेद है ही नहीं