Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
स्वप्नाद्दृश्येव जगतां तुलादेशेन केन च ।
तुलिता कलनोन्मुक्ता दृश्यश्रीर्व्योम जृम्भते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की जो दृश्यता हे, साक्षीरूप चैतन्य में एक ओर उसे ओर
दूसरी ओर स्वप्न को रख कर सार ओर असार का विवेक करने वाले बुद्धिरूप कटि (तुला) से
तोला जाय, तो जैसे जाग्रत में स्वप्न कल्पनाशून्य (असत्) हो जाता है, वैसे ही कल्पनाशून्य
होकर वही शून्यरूप से या ब्रह्मरूप से प्रतीत होती है