Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
जगत्यपिण्डग्राहेऽस्मिन्संकल्पनगरोपमे ।
मरौ सरिदिवाभाति दृश्यता भ्रान्तिरूपिणी ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मरुभूमि में भ्रान्तिरूपिणी नदी प्रतीत होती है, वैसे ही पूर्वोक्त रीति से
आकार रहित अतएव मनोरथ से कल्पित नगर के तुल्य इस जगत् में भ्रान्तिरूपिणी (भ्रमवश)
दृश्यता प्रतीत होती है