Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 15, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 15, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जगदेव महाकाशे चिदाकाशमभित्तिमत् ।
तद्देशस्याणुमात्रस्य तुलायाश्चाप्रपूरकम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से मायारूप आकाश
मेँ स्थित यह जगत् आवरण शून्य चिदाकाश ही है । यह चित् से अणुमात्र भाग का ओर अणुमात्र
परिमाण का पूरक (पूर्तिकरनेवाला) नहीं है । भाव यह कि परिच्छिन्न जगत् का चित् से अभेद
मानो, तो चित्त की भी परिच्छन्नजगन्मात्रता हो जायेगी, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि
अत्यन्त सूक्ष्म अन्तःकरण की वृत्ति ओर चित्त की वासना से परिच्छन्न सूक्ष्मतम चिद्भाग में
भी सम्पूर्ण जगत् के परिच्छेद का भान होता है, इस कारण उक्त अणुतम चेतन में समा सकने
योग्य जगत् जब उक्त अणुतम चित् का पूरक नहीं होता, तब अखण्ड ब्रह्मचैतन्य का वह
पूरक हो और उससे ब्रह्म में परिच्छिन्नजगन्मात्रता है यह तो अत्यन्त असंभव है