Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, Verses 25–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 16, verses 25–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
इत्याकर्ण्य द्विजमुखाच्चिन्तयामास सा पुनः ।
इदं स्वप्रज्ञयैवाशु भीता प्रियवियोगतः ॥ २५ ॥
मरणं भर्तुरग्रे मे यदि दैवाद्भविष्यति ।
तत्सर्वदुःखनिर्मुक्ता संस्थास्ये सुखमात्मनि ॥ २६ ॥
अथ वर्षसहस्रेण भर्तादौ चेन्मरिष्यति ।
तत्करिष्ये तथा येन जीवो गेहान्न यास्यति ॥ २७ ॥
तद्भ्रमद्भर्तृजीवेऽस्मिन्निजे शुद्धान्तमण्डपे ।
भर्त्रा विलोकिता नित्यं निवत्स्यामि यथासुखम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्राह्मणों के मुख से यह बात सुनकर अपने प्रिय के वियोग से भयभीत लीला ने अपनी बुद्धि से
ही फिर यह बात विचारी कि यदि दैवयोग से पति से पहले मेरा शरीर छूट गया, तो मैं सम्पूर्ण
दुःखों से निर्मुक्त होकर आत्मा में सुखपूर्वक स्थित हो जाऊँगी । यदि मेरा पति मुझसे हजार
वर्ष पहले मर गया, तो मैं वैसा प्रयत्न करूँगी जैसे कि उसका जीव घर से बाहर नहीं जा
सकेगा