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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 16, Verses 41–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 16, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

इत्याकर्ण्य जगन्माता तवास्त्वेवमिति स्वयम् । उक्त्वान्तर्धानमगमत्प्रोत्थायोर्मिरिवार्णवे ॥ ४१ ॥ अथ सा राजमहिषी परितुष्टेष्टदेवता । श्रुतगीतेव हरिणी बभूवानन्दधारिणी ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

विलीन हो जाती है, वैसे ही अन्तर्धान हो गई